स्थितप्रज्ञ: वह अवस्था जहाँ आत्मा परमशांति को छूती है
स्थितप्रज्ञ वह आत्मा है जो सुख-दुःख, हार-जीत, लाभ-हानि की लहरों में भी सागर जैसी शांत रहती है। जब आत्मा परमात्मा को जानकर अपने ब्रह्मस्वरूप में स्थित होती है, तभी वह स्थितप्रज्ञ बनती है — यही परमशांति की सच्ची अवस्था है। यह अवस्था ही आत्मा को परम तत्वों से जोड़कर विश्व परिवर्तन का कारण बनती है।”