योग दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएँ
एक नज़र में · मुख्य बिंदु
- योग = युज् = मिलन — इसका असली अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन, केवल आसन नहीं।
- अष्टांग योग की 8 सीढ़ियाँ — यम से समाधि तक; आरंभ आचरण से, अंत आत्म-साक्षात्कार में।
- प्राण स्थिर तो मन स्थिर — प्राणायाम सूक्ष्म शरीर व नाड़ियों को शुद्ध करता है (हठयोगप्रदीपिका 2.2)।
- महावाक्य — तत्त्वमसि · अहं ब्रह्मास्मि: आत्मा और परमात्मा मूलतः एक हैं।
- बापूजी का सार — शरीर का योग पहली सीढ़ी, आत्मा का योग परम लक्ष्य; "पहले अनुभव, फिर श्रद्धा"।
परमशांति, अहमदाबाद। वर्ष में एक दिन ऐसा आता है जब समस्त विश्व एक स्वर में योग का स्मरण करता है। 21 जून — वर्ष का सबसे दीर्घ दिवस, जब सूर्य अपने पूर्ण प्रकाश पर होता है — अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर सनातन परंपरा में योग केवल आसन या व्यायाम नहीं है। 'योग' शब्द संस्कृत के 'युज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है — जोड़ना, मिलाना, एक करना। प्रश्न केवल इतना है: किसका मिलन किससे? यही इस लेख की यात्रा है — स्थूल से सूक्ष्म की ओर, और सूक्ष्म से परम की ओर।
हमारे ऋषियों ने योग को एक सम्पूर्ण विज्ञान के रूप में देखा — एक ऐसा मार्ग जो शरीर को स्वस्थ करता है, मन को शांत करता है, बुद्धि को स्थिर करता है, संस्कारों को निर्मल करता है, और अंततः आत्मा को उसके मूल स्वरूप तथा परमात्मा से जोड़ देता है। आइए, इस पूरे मार्ग को क्रम से समझें।
मन, बुद्धि, शरीर और संस्कार पर योग का प्रभाव
महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में योग की सबसे सटीक परिभाषा दी है। उनके अनुसार योग का मूल उद्देश्य चित्त (मन) की चंचल वृत्तियों को शांत करना है।
"योग, चित्त की वृत्तियों (हलचलों) का निरोध है।" अर्थात् जब मन की निरंतर भागदौड़ शांत हो जाती है, तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।
इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पतंजलि ने अष्टांग योग — योग के आठ अंगों — का मार्ग बताया। यह एक सीढ़ी की भाँति है, जहाँ प्रत्येक चरण व्यक्ति के एक अलग आयाम को निर्मल करता है — आचरण, शरीर, प्राण, मन और अंततः आत्मा को।
| अंग | स्वरूप | किस पर प्रभाव |
|---|---|---|
| यम | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह — समाज एवं स्वयं के प्रति संयम | संस्कार एवं आचरण की शुद्धि |
| नियम | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान — आंतरिक अनुशासन | अंतःकरण एवं संस्कार |
| आसन | स्थिर एवं सुखद बैठक; शरीर को साधना के योग्य बनाना | स्थूल शरीर |
| प्राणायाम | श्वास एवं प्राण-ऊर्जा का नियमन | प्राण एवं सूक्ष्म शरीर |
| प्रत्याहार | इन्द्रियों को बाहरी विषयों से भीतर की ओर मोड़ना | मन एवं इन्द्रियाँ |
| धारणा | मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना | एकाग्रता एवं बुद्धि |
| ध्यान | उस केंद्र पर चित्त का अखंड, निरंतर प्रवाह | मन एवं चेतना |
| समाधि | ध्याता और ध्येय का एक हो जाना — परम मिलन | आत्मा का परम स्वरूप |
ध्यान दीजिए कि योग की यह यात्रा आचरण (यम-नियम) से आरंभ होती है, न कि आसन से। इसका गूढ़ संकेत यह है कि जब तक संस्कार निर्मल नहीं होते, तब तक मन कभी शांत नहीं हो सकता। तप और स्वाध्याय पुराने नकारात्मक संस्कारों को क्षीण करते हैं और सात्त्विक संस्कारों को सुदृढ़ करते हैं। इस प्रकार योग केवल शरीर ही नहीं, हमारे स्वभाव को रूपांतरित करता है।
बुद्धि की स्थिरता और मन का संतुलन
श्रीमद्भगवद्गीता योग को और भी सरलता से परिभाषित करती है — योग अर्थात् समता, संतुलन।
"सफलता और असफलता दोनों में समान भाव बनाए रखना ही योग कहलाता है।" यही बुद्धि की वह स्थिरता है जिसे योग जन्म देता है।
गीता आगे कहती है — "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता 2.50), अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है। जो व्यक्ति योगयुक्त है, वह तनाव, क्रोध और मोह से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों को कुशलता से निभाता है। इस प्रकार योग का प्रभाव चार स्तरों पर स्पष्ट दिखाई देता है — शरीर स्वस्थ एवं रोगमुक्त, मन शांत एवं एकाग्र, बुद्धि निर्मल एवं विवेकपूर्ण, और संस्कार सात्त्विक एवं दिव्य बनते जाते हैं।
प्राणायाम और सूक्ष्म शरीर का विज्ञान
सनातन शास्त्र मनुष्य को केवल इस स्थूल देह तक सीमित नहीं मानते। वेदांत के अनुसार हमारे भीतर तीन शरीर हैं — स्थूल शरीर (जो आँखों से दिखता है), सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि और प्राण का सूक्ष्म आवरण), और कारण शरीर (वह बीज-शरीर जिसमें हमारे समस्त संस्कार और कर्म संचित रहते हैं)।
तैत्तिरीय उपनिषद् इसे और सूक्ष्मता से पंचकोश के रूप में समझाता है — आत्मा पर चढ़े पाँच आवरण, जो एक के भीतर एक हैं:
- 1अन्नमय कोश — अन्न से बना स्थूल शरीर।
- 2प्राणमय कोश — प्राण-ऊर्जा का आवरण, जो शरीर को जीवंत रखता है।
- 3मनोमय कोश — विचारों और भावनाओं का स्तर।
- 4विज्ञानमय कोश — बुद्धि एवं विवेक का स्तर।
- 5आनंदमय कोश — आनंद का सूक्ष्मतम आवरण, आत्मा के सर्वाधिक निकट।
यहीं प्राणायाम का गूढ़ रहस्य प्रकट होता है। श्वास केवल वायु का आना-जाना नहीं — श्वास के साथ बहता है प्राण, वह सूक्ष्म जीवन-ऊर्जा जो सूक्ष्म शरीर की हज़ारों नाड़ियों में प्रवाहित होती है। इनमें तीन प्रमुख हैं — इडा, पिंगला और सुषुम्ना। प्राणायाम इन नाड़ियों को शुद्ध करता है (नाड़ी-शुद्धि), जिससे प्राण निर्बाध बहता है और चेतना ऊर्ध्वगामी होती है।
योग का सबसे सुंदर सूत्र हठयोगप्रदीपिका में मिलता है, जो प्राण और मन के अटूट संबंध को उजागर करता है:
"जब प्राण (श्वास) चंचल होता है, तब मन भी चंचल हो जाता है; और जब प्राण स्थिर हो जाता है, तब मन भी स्थिर हो जाता है।" यही कारण है कि प्राणायाम से मन को साधा जा सकता है।
यही सूक्ष्म-शरीर का विज्ञान है — प्राणायाम से प्राण-प्रवाह संतुलित होता है, सूक्ष्म शरीर के मल (अशुद्धियाँ) धुलने लगते हैं, साधक का आभामंडल (aura) निर्मल और तेजस्वी होता है, और उसकी आंतरिक तरंगें (vibration) उच्च होती जाती हैं। बापूजी दशरथभाई पटेल के बेहद ज्ञान में भी इन्हीं सूक्ष्म प्रक्रियाओं — आभा-शुद्धि, कोशिका-शुद्धि और कारण शरीर की निर्मलता — का गहन वर्णन मिलता है, जहाँ आत्मा की शक्ति बढ़ने पर आभामंडल श्वेत प्रकाशमय हो उठता है।
आत्मा का परमात्मा से योग
अब हम लेख के हृदय तक पहुँचते हैं। यदि 'योग' का अर्थ 'मिलन' है, तो योग का चरम लक्ष्य कोई आसन या साँस की क्रिया नहीं — वह है आत्मा का परमात्मा से मिलन। अष्टांग योग की आठवीं और अंतिम सीढ़ी समाधि इसी मिलन की अवस्था है, जहाँ साधक और परम सत्ता के बीच का भेद मिट जाता है।
उपनिषदों के महावाक्य इसी परम सत्य की घोषणा करते हैं — आत्मा और परमात्मा मूलतः एक ही हैं:
"वह (परम तत्त्व) तू ही है।" · "मैं ब्रह्म हूँ।" · "यह आत्मा ही ब्रह्म है।" — आत्मा का अपने परम स्रोत के साथ एकत्व ही ज्ञान का शिखर है।
कठोपनिषद् इस मार्ग को एक अमर रूपक से समझाता है। मनुष्य के जीवन को एक रथ कहा गया है:
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
"आत्मा को रथ का स्वामी जानो, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम।" इन्द्रियाँ घोड़े हैं और विषय वे मार्ग जिन पर वे दौड़ते हैं। योग वह कला है जिससे बुद्धि-रूपी सारथी मन-रूपी लगाम को थामकर रथ को आत्मा के परम धाम तक ले जाता है।
प्रश्न उठता है — जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है, तब क्या होता है? शास्त्र एक स्वर से उत्तर देते हैं। तब साधक को मिलती है परम शांति — वह शांति जिसे कोई बाहरी परिस्थिति डिगा नहीं सकती। उसे प्राप्त होता है अखंड आनंद, गहन निर्भयता, और सबसे बड़ा वरदान — कर्म और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति। आत्मा अपने मूल स्वरूप — शुद्ध, चैतन्य, प्रकाशमय — में पुनः स्थित हो जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय इसी ध्यानयोगी का वर्णन करता है, जो परमात्मा में स्थित होकर परम शांति और समता को प्राप्त होता है।
बापूजी दशरथभाई पटेल का परम सन्देश: असली योग
बापूजी दशरथभाई पटेल अपने बेहद ज्ञान में इसी परम सत्य को आज के युग की भाषा में, अत्यंत स्पष्टता के साथ प्रकट करते हैं। वे शरीर के योग का निषेध नहीं करते — वे कहते हैं कि स्वस्थ शरीर साधना का आधार है, और शारीरिक योग जीवन के लिए आवश्यक है। परंतु वे एक गहन चेतावनी भी देते हैं: यदि हम केवल आसन और प्राणायाम तक ही रुक गए, तो हम योग की पहली सीढ़ी पर खड़े रहकर उसकी मंज़िल से वंचित रह जाएँगे।
सच्चा योग आत्मा का परमात्मा से मिलन है।
— बापूजी दशरथभाई पटेलबापूजी समझाते हैं कि हम यह नश्वर देह नहीं, बल्कि अमृत-रूपी आत्माएँ हैं — चैतन्य, अमर और प्रकाशमय। हमारा असली परिचय शरीर से नहीं, आत्मा से है। इसीलिए असली योग देह का व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा का अपने परम स्रोत — परमात्मा — से पुनर्मिलन है। यही वह योग है जो जन्मों के कर्मों को निर्मल करता है और कारण शरीर तक को शुद्ध कर देता है।
बापूजी के अनुसार मनुष्य का अनियंत्रित मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है — और यही बात गीता भी कहती है: "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" (गीता 6.6), अर्थात् मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। जब आत्मा परमात्मा से जुड़ जाती है, तब वही मन शांत होकर हमारा सबसे बड़ा मित्र बन जाता है।
बापूजी कहते हैं कि सच्चे ध्यान में आत्मा स्वयं को शुद्ध करती है — उसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उसने परमात्मा से सीधा संबंध स्थापित कर लिया है। यही उसे अपूर्व शक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करता है।
उनका एक और अमूल्य सूत्र है — "जैसी संगति, वैसी रंगत।" जो मनुष्य प्रकाश के सागर, परम सत्ता से जुड़ता है, वह स्वयं भी परमात्मा-तुल्य होता चला जाता है। और इसीलिए वे एक सरल किंतु गहन साधना देते हैं — "परम शांति का चिंतन करो, परम शांति बोलो, और तुम्हें परम शांति प्राप्त होगी।" यह 'परम शांति' कोई बाहरी उपलब्धि नहीं — यह आत्मा की मूल अवस्था है, सृष्टि की सर्वोच्च तरंग है।
बापूजी के बेहद ज्ञान की सबसे विशिष्ट बात यह है कि वह अंधश्रद्धा नहीं माँगता। उनका सिद्धांत है — पहले अनुभव, फिर श्रद्धा। जब साधक स्वयं ध्यान में आत्मा-परमात्मा के मिलन का अनुभव करता है, तब उसकी श्रद्धा अनुभव के ठोस आधार पर खड़ी होती है। और तभी चरितार्थ होता है उनका मूल उद्घोष — "ज्ञानी ही प्रकाश है।" ऐसा साधक इसी जीवन में जीवनमुक्ति की ओर बढ़ सकता है।
पहली सीढ़ी से परम लक्ष्य तक
इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हम सब योग को अवश्य अपनाएँ — आसन से शरीर को सुदृढ़ करें, प्राणायाम से प्राण को संतुलित करें, ध्यान से मन को शांत करें। यह सब आवश्यक है, यह सब कल्याणकारी है। परंतु यहीं न रुकें। शरीर का योग पहली सीढ़ी है — आत्मा का योग ही परम लक्ष्य है। शरीर एक दिन छूट जाएगा, पर आत्मा का परमात्मा से जुड़ा यह संबंध शाश्वत है। यही सनातन शास्त्रों की पुकार है, और यही बापूजी दशरथभाई पटेल के बेहद ज्ञान का केंद्रीय सन्देश है।
योग से जुड़े सामान्य प्रश्न
सच्चा योग क्या है?
'योग' शब्द का अर्थ क्या है?
अष्टांग योग के आठ अंग कौन-से हैं?
प्राणायाम मन को कैसे शांत करता है?
बापूजी दशरथभाई पटेल के अनुसार असली योग क्या है?
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?
मन व योग के लिए श्रेष्ठ पुस्तकें
बापूजी दशरथभाई पटेल के बेहद ज्ञान पर आधारित — मन, ध्यान, प्राण और आत्मा की गहराइयों में ले जाती ये पुस्तकें पूर्णतः निःशुल्क उपलब्ध हैं।
आत्मा का योग ही असली योग है।
